Shree Ganesha ji Ki Kahani | श्री गणेश जी की जन्म कथा

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प्रथम पूज्य श्री गणेश

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभः निर्विघ्नं कुरुमे देवः सर्वकार्येषु सर्वदा।

अर्थात घुमावदार सूंड वाले , विशाल शरीर वाले , करोड़ो सूर्य की भांति महान प्रभु आप मेरे सारे कार्यो को बिना विघ्न पूर्ण करें।

गणेश जी को प्रथम पूज्य कहा जाता है।

उनके प्रथम पूजे जाने और ऐसे शरीर को लेकर अनेक कथाएं प्रचलित है।

जो कि गणेश जी के जन्म से भी जुड़ी हुई है।

गणेश जी का जन्म भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ था।

श्री गणेश के जन्म को लेकर शिवपुराण, वराहपुराण, स्कन्द पुराण, गणेश चालीसा आदि में कथाए वर्णित की गई है।

जन्म से जुड़ी सबसे ज्यादा प्रचलित कथा में से शिवपुराण की है।

चलिए जानते है गजानंद जी की कहानी :-

शिवपुराण में गणेश जी के जन्म की कथा

एक बार शिवजी के नंदी द्वारा पार्वती माता की आज्ञा का पालन नही किया गया।

इससे माता नाराज हो गई और माँ पार्वती ने निश्चय किया कि में भी एक ऐसा पुत्र उत्पन्न करुँगी।

जो हमेशा मेरी आज्ञा का पालन करेगा मेरे निर्देशो पर कार्य करेगा।

तब माता ने अपने शरीर के मेल को साफ करने के लिए हल्दी का उबटन बनाकर उसे लगाया।

हल्दी के उबटन को हटाने के बाद उससे एक मूर्ति का निर्माण किया और उसमें प्राण डाले।

जिस बालक का जन्म हुआ उसे दरवाजे पर ये आज्ञा देकर खड़ा किया कि कोई भी आए उसे अंदर मत आने देना और स्वयं नहाने लगी।

इसी बीच महादेव का वहाँ आना हुआ महादेव अंदर जाने का बोले लेकिन द्वार पर खड़े गणेश जी ने उनको जाने से मन कर दिया।

दोनों के बीच इस बात पर युध्द होने लगा क्रोधित होकर महादेव ने त्रिशूल से गणेश जिनकी गर्दन काट दी।

जब माता पार्वती नहाकर आई तो बालक की गर्दन कतई देकर रोने लगी और महादेव को सारी बात बताई की ये मेरा पुत्र था।

महादेव ने अपनी गलती को सुधारने के लिए गरुड़ जी को उत्तर दिशा में भेजा ,

ओर बोला की जो भी माँ अपने बच्चे की तरफ पीठ कर के सोई हो उस बालक की गर्दन ले आना।

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गरुड़ जी को ऐसी कोई माँ नही मिली लेकिन एक हथिनी अपने बच्चे की तरफ पीठ कर के सोई थी उस बच्चे का सिर गरुड़ जी ले आए।

महादेव ने उस सिर को बालक के शरीर पर लगाकर उसे जीवित किया और ये वरदान दिया कि तुम हर कार्य मे प्रथम पूजें जाओगे।

जो भी हर कार्य मे तुम्हे पहले पूजेगा उसके सभी कार्य सिद्ध होंगे।

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वराहपुराण अनुसार जन्म कथा

शिवजी गणेश जी को पंचतत्वों से मिलाकर बना रहे थे।

तब देवता में यह चिंता होने लगी कि शिव जी पंचतत्वों से किसी को बनाएगे तो वो आकर्षक का केंद्र बन जाएगा,

और सब उसकी ओर ही आकर्षित होंगे बाकी सबकी महिमा काम हो जाएगी।

देवताओं की इस चिंता को शिव जी समझ गए।

उन्होंने गणेश जी का पेट बड़ा कर दिया और मुख हाथी के समान बना दिया।

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स्कन्दपुराण अनुसार जन्म कथा

स्कन्दपुराण के स्कन्द अर्बुद खंड में गणेश जी के जन्म से जुड़ी कथा का वर्णन किया गया है।

उसके अनुसार भगवान शंकर द्वारा माता पार्वती को वरदान दिया कि तुमको पुत्र रत्न की प्राप्ति हो।

इसके बाद गणेश जी ने अर्बुद पर्वत (माउंट आबू) पर जन्म लिया।

देवताओं ने वह पहुँचकर गोबर से एक मूर्ति का निर्माण किया तबसे वो पूजी जाती है।

आज वो सिद्धि गणेश के नाम से जानी जाती है।

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गणेश चालीसा अनुसार जन्म कथा

गणेश चालीसा में वर्णित है कि-

माता पार्वती ने एक बार पुत्र प्राप्ति हेतु कठोर तप किया,

जब यज्ञ पूरा हुआ तब गणेश जी स्वयं प्रकट हुए माता पार्वती ने गणेश जी को मेहमान समझ बहुत प्रकार से उनकी सेवा की।

प्रसन्न होकर गणेश जी ने पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। बिना गर्भ धारण किये ही माता को पुत्र की प्राप्ति हुई।

सारे देवता उन्हें देखने के लिए कैलाश पर्वत पर गए।

शिव जी और पार्वती जी ने बहुत से दान दिए।

शनि देव अपनी दृष्टि से बालक को देखने से बच रहे थे लेकिन ये देखकर पार्वती माता नाराज हो गई।

इस कारण शनि देव को बालक को देखना पड़ा जैसे ही उनकी दृष्टि बालक पर पड़ी तो उनका सिर आकाश में चला गया।

ये देखकर पार्वती माता बेहोश होकर गिर गई।

तुरंत विष्णु भगवान गरुड़ पर जाकर हाथी का सिर लाए और बालक से शरीर पर लगाया।

शिव जी ने उसमे प्राण डाले।

शंकर भगवान ने गणेश नाम देकर प्रथम पूजे जाने का वरदान दिया।

दोस्तो बालक गणेश की कहानी के बारे में बताए गए कथा के बारे आपकी क्या राय है,

कृपया Comment में जरूर बताएं,

श्री गणेश जी की जन्म कथा ये जानकारी अगर आपको अच्छी लगी हो तो…

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